मध्य प्रदेश का Indore शहर लंबे समय से “देश की नमकीन राजधानी” के रूप में जाना जाता है। यहां बनने वाली नमकीन भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी अपनी खास पहचान रखती है।
लेकिन मौजूदा समय में इंदौर का यह मशहूर उद्योग दोहरी मार झेल रहा है—एक तरफ बढ़ती उत्पादन लागत और दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण निर्यात कारोबार पर असर।
बढ़ती लागत से महंगी हुई नमकीन
पिछले कुछ महीनों में कच्चे माल की कीमतों में तेज़ उछाल देखने को मिला है।
- बेसन, तेल और मसालों के दाम बढ़े
- पैकेजिंग लागत में भी इजाफा
- कुल मिलाकर उत्पादन खर्च में भारी बढ़ोतरी
इसका सीधा असर बाजार में नमकीन की कीमतों पर पड़ा है।
व्यापारियों के अनुसार, नमकीन के दाम में ₹20 से ₹40 प्रति किलो तक की बढ़ोतरी हुई है।
मुनाफा और मांग के बीच संतुलन मुश्किल
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि:
- कीमत बढ़ाने पर ग्राहक कम हो सकते हैं
- कीमत न बढ़ाने पर मुनाफा घटता है
ऐसे में कारोबारियों के लिए संतुलन बनाना बड़ी चुनौती बन गया है।
अंतरराष्ट्रीय तनाव से प्रभावित निर्यात
हाल के दिनों में Iran, Israel और United States के बीच बढ़ते तनाव का असर निर्यात पर साफ दिख रहा है।
- विदेशों से ऑर्डर लगभग आधे हो गए
- गल्फ देशों में सप्लाई लगभग ठप
- करोड़ों रुपये का नुकसान
पहले जहां नियमित ऑर्डर मिलते थे, अब मांग में भारी गिरावट आई है।
हर दिन 100 टन नमकीन की सप्लाई
Indore से हर दिन करीब 100 टन नमकीन देश और विदेशों में भेजी जाती है।
- 80+ देशों में सप्लाई
- हजारों लोगों को रोजगार
- करोड़ों का कारोबार
लेकिन अब निर्यात कम होने से उत्पादन भी घटाना पड़ रहा है।
छोटे व्यापारियों पर सबसे ज्यादा असर
इस संकट का सबसे ज्यादा असर छोटे और मध्यम व्यापारियों पर पड़ा है।
- बड़े ब्रांड किसी तरह टिके हुए हैं
- छोटे कारोबारी आर्थिक दबाव में
- कई यूनिट्स पर बंद होने का खतरा
सरकार से उम्मीदें
उद्योग से जुड़े लोग सरकार से राहत की मांग कर रहे हैं:
- कच्चे माल पर टैक्स में छूट
- निर्यात बढ़ाने के लिए विशेष योजनाएं
- नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों की तलाश
साथ ही, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए बिक्री बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है।
समाधान क्या हो सकते हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार:
- डिजिटल प्लेटफॉर्म पर विस्तार
- नए देशों में मार्केटिंग
- लागत कंट्रोल रणनीति
इन उपायों से नुकसान की भरपाई संभव है।
निष्कर्ष
इंदौर का नमकीन उद्योग इस समय कठिन दौर से गुजर रहा है। बढ़ती लागत और वैश्विक परिस्थितियों के कारण कारोबार की रफ्तार धीमी हो गई है।
हालांकि, सही रणनीति और सरकारी सहयोग से यह उद्योग फिर से उभर सकता है और अपनी पुरानी पहचान वापस पा सकता है।





